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Politics

300 दामिनियो पर इतनी ख़ामोशी क्यों?

2015-08-21

मेरा बचपन भी एक साधारण परिवार में गुजरा है लेकिन जिस तबके की ये कहानी है उसमे पले बढे शायद ही कोई हो जिन तक मेरा यह ब्लॉग पहुंचे. मेरा दावा है की जिनकी मानवीय संवेदनाये अब तक जिन्दा है ऐसे लोग इस कहानी को पढ़ने के बाद शायद ही सहज महसूस कर पाए. कोबरापोस्ट नामक एक वेबसाइट ने कुछ दिनों पहले दिल्ली में प्रेस वार्ता कर एक बड़ा खुलासा करने का दावा किया. मुझे यह जानकारी ट्विटर पर पता लगी. रात को टीवी के सभी चैनल पलट कर देख लिए लेकिन शायद किसी भी चैनल ने इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की. हाँ कुछ चैनल्स पर एक तोते की गिरफ्तारी की खबर और उसपर बहस जरुर देखने को मिली.

इस कहानी को समझाने के लिए आपको कहानी के पात्रो के बिच पहुँचना होगा. कल्पना करिए की आप बिहार के किसी छोटे से गाव में एक ऐसे परिवार में जन्मे है जो महीने में 20 दिन भूके सोते है. सोचिये क्या गुजरती होगी उस माँ पर जो अपने साल दो साल के शिशु को दूध की जगह पानी पिलाकर सुलाती होगी, जिसकी झोपड़ी में पंखा तो दूर रोशनी के लिए बिजली तक न हो. क्या गुजरती होगी उस बाप पर जब वो अपने छोटे छोटे बच्चो को टोफिया या खिलौने तो दूर भूक मिटाने के लिए रोटी तक न दे सकता हो. साथ ही आप एक ऐसी जाती या धर्म से है जिसे आसपास के लोग शायद इन्सान भी नहीं समझते.

ऐसे ही एक तबके की कहानी नहीं बल्कि आपबीती कोबरापोस्ट के इन वीडियोज में देखने को मिलेगी. अब तक मैं आधे भी विडियो नहीं देख पाया लेकिन शर्मिंदा हु की हमारे ही देश में आज भी ऐसी दरिंदगी, ऐसी हैवानियत जीवित है. उस अभागी दामिनी का शायद यही एक सौभाग्य रहा होगा की मरने के बाद उसके समर्थन में पुरे देश का पढ़ा लिखा युवा मोमबत्तिया लेकर इंडिया गेट पहुँच गया, पुलिस के डंडे भी खाए. लेकिन दिल्ली से मिलो दूर रोजाना ऐसी कई दामिनीयो का दमन होता रहता है जिनकी चींख हम तक नहीं पहुँच पाती. उन्हें हमसे जोड़ने वाले मीडिया को खोज रहती उस तोते की जिसे गालिया देने के आरोप में थाने लाया गया.

कोबरा पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक रणवीर सेना नामक एक संघटन ने सन 1995 से 2000 के बिच बिहार के आरा, अरवल, भोजपुर, गया, औरंगाबाद और जहानाबाद में करीब 16 जनसंहारो को अंजाम दिया जिसमे करीब 300 गरीब, दलित और आदिवासियों की हत्या कर दी गई. इनमे आधे से अधिक महिला और बच्चे थे. कही पर दिन दहाड़े लोगो को एक साथ खड़ा कर गोलियों से भुन दिया गया तो कही झोपड़ियो में आग लगा दी गई. गर्भवती महिलाओ के गर्भ में पल रहे बच्चे को महिला का पेट काट कर बाहर निकला गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई. गेंद से खेलने की उम्र में बछि को गेंद की तरह उछाल कर उसपर वार किया और उसकी गर्दन कांट दी. हैवानियत के इस नंगे नाच को लिखना मेरे लिए उतना ही मुश्किल है जितना आपके लिए इसे पढना.

१ दिसंबर १९९७ जहानाबाद लक्ष्मणपुर में ५८ दलितों की हत्या कर दी गई. रात को हुए इस नरसंहार में 27 महिलाये और 16 बच्चे मारे गए महिलाओ के गर्भ पल रहे बच्चो को पेट से निकाल कर मार दिया. इस नरसंहार के जिम्मेदार रणवीर सेना को राजनैतिक सरंक्षण होने का आरोप लगा. इस आरोप की जाँच करने के लिए बिहार सरकार ने अमीरदास जाँच आयोग का गठन कर दिया. कोबरा पोस्ट का दावा है की इस जाँच में कई बीजेपी नेताओ का नाम सामने आया. बिहार में बीजेपी जेडीयु की सरकार बनने के बाद जाँच पूरी होने से पहले ही इस आयोग को बंद कर दिया गया.

नरसंहारो की जाँच बिहार पुलिस द्वारा हुई. जाँच में न कभी हथियारों की बरामदी हुई न कोई साइंटिफिक एविडेंस मिला जिससे आरोपियों की सजा दी जा सके. अधिकतर मामलों में सेशन कोर्ट ने आरोपियों को मौत या उम्रकैद की सजा सुनाई लेकिन तक़रीबन सभी मामलो में पटना उच्च न्यायालय द्वारा करीबन सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया. कोबरा पोस्ट के विडियो में कुछ लोगो ने आरोप लगाया की पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश उसी जाती के थे जिनपर हत्या का आरोप था और उन्होंने ही ऐसे 3 मामलो में सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

पिछड़े समाज के इन गरीब परिवारों के पास न्याय पाने का कोई रास्ता नहीं. इनके लिए नरसंहारो की जाँच बिहार पुलिस ने की और public प्रासीक्यूटर ने इनका मुकदमा लड़ा. ऐसी घटनाओ की गवाही कौन देगा? जो लोग औरतो और छोटे बच्चो को इस हैवानियत के साथ मौत के घाट उतार सकते है उनके खिलाफ गवाही देने की हिम्मत कोई कैसे जुटा सकता है जिसे गवाही देने के बाद रहना उसी गाव में है. 20 - 25 साल के इन्तेजार के बाद सभी आरोपी बरी हो गए.

कोबरापोस्ट के एक विडियो में इन नरसंहारो की आरोपी रणवीर सेना के एक कमांडर का कबूलनामा है जिसमे आरोपी ने उस पुरे नरसंहार को किस तरह अंजाम दिया गया ये खुद बताया. इस हत्याकांड में शामिल अपने सभी साथियों के नाम भी बताये. कोबरा पोस्टने अपने इस स्टिंग ऑपरेशन से जुड़े सभी विडियो youtube पर डाल रखे है. आश्चर्य की बात है की इस खुलासे के बावजूद मीडिया को मानो सांप सूंघ गया हो. अम्बेडकर परियेर नामक दलित विद्यार्थियों के संघटन पर पाबन्दी लगी तो पुरे देश का मीडिया, सोशल मीडिया एक साथ खड़ा हो गया, नेताओ के बयान आने लगे. इस कहानी पर न कोई पार्टी कुछ बोलती है, न दलितों को हक़ की लड़ाई लड़ने वाले बुद्धिजीवी.

उन गरीब परिवारों को शायद ही अब कोई उम्मीद बची हो. लेकिन मुझे विश्वास है की इस लेख को पढ़ने वाला हर व्यक्ति प्रयास करेगा की यह दास्तान सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक से अधिक लोगो तक पहुंचाई जाएगी. जब एक दामिनी के लिए सोशल मीडिया पुरे देश को खड़ा कर सकता है तो इन 300 बेकसूरों की जघन्य हत्याओ पर इतनी ख़ामोशी क्यों?

https://www.youtube.com/watch?v=E9b3rP079PY

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